(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.43. अध्यायः 043
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिराज्ञया भीमादिभिश्चतुर्भिर्दुर्योधनादिगृहपरिग्रहः॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच। 12-43-0x(5428)(66381)
ततो विसर्जयामास सर्वास्ताः प्रकृतीर्नृपः।
विविशुश्चाभ्यनुज्ञाता यथास्वानि गृहाणि ते॥ 12-43-1(66382)
ततो युधिष्ठिरो राजा भीमं भीमपराक्रमम्।
सान्त्वयन्नब्रवीच्छ्रीमानर्जुनं यमजौ तथा॥ 12-43-2(66383)
शत्रुभिर्विविधैः शस्त्रैः क्षतदेहा महारणे।
श्रान्ता भवन्तः सुभृशं तापिताः शोकमन्युभिः॥ 12-43-3(66384)
अरण्ये दुःखवसतिर्मत्कृते भरतर्षभाः।
भवद्भिरनुभूता हि यथा कापुरुषैस्तथा॥ 12-43-4(66385)
यथासुखं यथाजोषं जयोऽयमनुभूयताम्।
विश्रान्ताँल्लब्धविश्वासाञ्श्वः समेताऽस्मि वः पुनः॥ 12-43-5(66386)
ततो दुर्योधनगृहं प्रासादैरुपशोभितम्।
बहुरत्नसमाकीर्णं दासीदाससमाकुलम्॥ 12-43-6(66387)
धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातं भ्रात्रा दत्तं वृकोदरः।
प्रतिपेदे महाबाहुर्मन्दिरं मघवानिव॥ 12-43-7(66388)
यथा दुर्योधनगृहं तथा दुःशासनस्य तु।
प्रासादभालासंयुक्तं हेमतोरणभूषितम्॥ 12-43-8(66389)
दासीदाससुसंपूर्णं प्रभूतधनधान्यवत्।
प्रतिपेदे महाबाहुरर्जुनो राजशासनात्॥ 12-43-9(66390)
दुर्मर्षणस्य भवनं दुःशासनगृहाद्वरम्।
कुबेरभवनप्रख्यं मणिहेमविभूषितम्॥ 12-43-10(66391)
नकुलाय वरार्हाय कर्शिताय महावने।
ददौ प्रीतो महाराज धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥ 12-43-11(66392)
दुर्मुखस्य च वेश्माग्र्यं श्रीमत्कनकभूषणम्।
पूर्णपझदलाक्षीणां स्त्रीणां शयनसंकुलम्॥ 12-43-12(66393)
प्रददौ सहदेवाय संततं प्रियकारिणे।
मुमुदे तच्च लब्ध्वाऽसौ कैलासं धनदो यथा॥ 12-43-13(66394)
युयुत्सुर्विदुरश्चैव सञ्जयश्च विशांपते।
सुधर्मा चैव धौम्यश्च यथा स्वाञ्जग्मुरालयान्॥ 12-43-14(66395)
सह सात्यकिना शौरिरर्जुनस्य निवेशनम्।
विवेश पुरुषव्याघ्रो व्याघ्रो गिरिगुहामिव॥ 12-43-15(66396)
तत्र भक्ष्यान्नपानैस्ते मुदिताः सुसुखोषिताः।
सुखप्रबद्धा राजानमुपतस्थुर्युधिष्ठिरम्॥ ॥ 12-43-16(66397)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः॥ 43॥


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